बीस साल मैंने अपनी शुगर को अनदेखा किया। फिर आईने ने एक सवाल पूछा।
बीस बरस पहले जब मेरी शुगर पहली बार निकली, मैंने उसे बीमारी नहीं, बस एक अंक समझा। शरीर में कमज़ोरी आई तो उम्र का बहाना बनाया। चेहरे पर मायूसी उतरी तो काम का बोझ कहा। एक दिन आईने ने पूछा, "यह चेहरा किसका है?"
उसी दिन मेरी असली खोज शुरू हुई। मैंने किताबें पढ़ीं, डॉक्टरों के दरवाज़े खटखटाए, यूट्यूब के अनगिनत वीडियो देखे, और हर बात ख़ुद पर आज़माकर देखी। फिर मुझे अपने सवालों के जवाब मिले।
मैं मधुमेह को उलट नहीं पाया। पर उसे क़ाबू में रखा है, और जब से थाली और दिनचर्या को अनुशासन में बाँधा, मैं पहले से कहीं बेहतर महसूस करता हूँ।
मेरे पिताजी और माताजी, दोनों मधुमेह के रोगी थे। तीस बरस मैंने उनकी सेवा की। पिताजी अस्सी बरस की उम्र तक जिए। आज मैं ख़ुद टाइप 2 का रोगी हूँ, और मेरा संकल्प है: मैं मधुमेह से नहीं मरूँगा, मैं सौ बरस जिऊँगा।
उसी सफ़र को मैंने एक कहानी में उतारा है।
"शुगर और 100 साल की ज़िंदगी"
डायबिटीज़ को क़ाबू में रखने की एक परिवार की सच्ची कहानी
यह कोई भारी-भरकम मेडिकल किताब नहीं। यह एक परिवार की कहानी है: पिताजी, माताजी, बेटा, बहू और दो बच्चे। एक रिपोर्ट का लिफ़ाफ़ा खुलता है, और उसके बाद उनके घर की थाली, चाल और सोच बदल जाती है। कहानी के बीच-बीच में आपको मिलेगा वह सब, जो मैंने बीस बरस में सीखा।
किताब के भीतर क्या है?
- ताले-चाबी का घरेलू विज्ञान: मधुमेह क्या है, इसे इतनी सरल भाषा में कि घर का हर सदस्य समझ ले।
- थाली का नया नक्शा: आधी थाली क्या, चौथाई क्या, और क्या कभी नहीं छोड़ना।
- 220 खाद्यों का GI-GL महा-कोश: पानी से मिठाई तक, हर चीज़ के आगे हरी, पीली या लाल बत्ती: कितनी मात्रा में खाएँ।
- 31 दिन का घंटे-दर-घंटे प्लान: सुबह उठने से रात सोने तक, हफ़्ते-दर-हफ़्ते की दिनचर्या।
- दावत, त्योहार और बाहर का खाना: जब थाली अपनी न हो।
- नीम-हकीम और व्हाट्सऐप के नुस्ख़ों से बचाव: "नाभि में तीन बूँद तेल, शुगर ख़त्म" जैसे दावों की पड़ताल, और ठगी से बचने की पाँच-सवाल की कसौटी।
- जाँचों का साल भर का कैलेंडर: कौन-सी जाँच कब, और रिपोर्ट पढ़ना।
यह किताब आपको रोज़ के उन सवालों के जवाब देती है जिनसे हर मरीज़ और उसका परिवार जूझता है: क्या खाऊँ? कब खाऊँ? कितना खाऊँ? किस बात पर भरोसा करूँ और किस पर नहीं? कब डॉक्टर के पास जाऊँ?
यह किताब किसके लिए है?
- जिन्हें हाल ही में मधुमेह या प्री-डायबिटीज़ का पता चला है और समझ नहीं आ रहा कहाँ से शुरू करें।
- जो बरसों से मधुमेह के साथ जी रहे हैं, पर रोज़ की थाली में अब भी उलझन है।
- जिनके घर में माता-पिता या कोई प्रियजन मधुमेह से जूझ रहा है, और परिवार का साथ देना चाहते हैं।
- जो यूट्यूब और व्हाट्सऐप की अफ़वाहों से थक चुके हैं।
एक ईमानदार बात
यह किताब कोई चमत्कार नहीं बेचती। यह इलाज का दावा नहीं करती, और यह नहीं कहती कि दवा छोड़ दीजिए। इसके हर पन्ने पर एक बात बार-बार लौटती है: दवा कभी अपने मन से बंद न करें, और हर फ़ैसला अपने पंजीकृत चिकित्सक से पूछकर लें। यह चिकित्सा-सलाह का विकल्प नहीं, कथा के रूप में स्वास्थ्य-शिक्षा है। लेखक विधि का प्राध्यापक है, चिकित्सक नहीं। पर इसके पीछे बीस बरस का उसका अपना अनुभव है।
क़ीमत सिर्फ़ ₹99
एक रेस्तराँ की चाय-नाश्ते की प्लेट से भी कम में, एक पूरी किताब: 220 से ज़्यादा पन्ने, 11 अध्याय, और 220 खाद्यों का कोश। मैंने जान-बूझकर इसे मुफ़्त नहीं रखा, क्योंकि जो चीज़ मुफ़्त मिलती है, उसे हम अक्सर पढ़ते नहीं। ₹99 इतना कम है कि बिना झिझक ख़रीदा जा सके, और इतना कि आप इसे गंभीरता से पढ़ें।
पहले चखिए: Read (Diabetic Diet Plan)
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इस किताब का मक़सद एक ही है: आप अकेले इस रास्ते पर न चलें।
— डॉ. वेणुधर रौतिया
प्रोफ़ेसर (विधि), पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ़)
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